“कांग्रेस ने हरियाणा में 5 लोकसभा सीटें कैसे जीत लीं?”
“कांग्रेस ने हरियाणा में 5 लोकसभा सीटें कैसे जीत लीं?”
Analytical Tone)
2024 का लोकसभा चुनाव…
हरियाणा की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लेकर आया।
जिस राज्य में 2019 में बीजेपी ने
10 की 10 सीटें जीत ली थीं…
वहीं 2024 में वही बीजेपी
5 सीटों पर सिमट गई।
और कांग्रेस…
जो पिछली बार शून्य पर थी…
वह अचानक 5 सीटों पर पहुँच गई।
तो सवाल ये नहीं है
कि कांग्रेस ने 5 सीटें जीत लीं…
सवाल ये है —
कांग्रेस कैसे जीत गई?
और फिर भी सत्ता तक क्यों नहीं पहुँच पाई?
आज इसी की अंदरूनी कहानी समझेंगे।
यह कोई “जादुई लहर” नहीं थी
सबसे पहले एक भ्रम तोड़ते हैं।
हरियाणा में कांग्रेस की जीत
कोई अचानक उठी हुई लहर नहीं थी।
यह एक निर्मित परिस्थिति थी।
बीजेपी 10 साल से सत्ता में थी।
धीरे-धीरे सत्ता के खिलाफ थकान जमा हो रही थी।
लोग नाराज़ थे —
लेकिन कांग्रेस से आश्वस्त नहीं थे।
यानी लोकसभा चुनाव में
लोगों ने सत्ता बदलने का नहीं…
विरोध दर्ज कराने का वोट दिया।
किसान आंदोलन: सबसे बड़ा फैक्टर
हरियाणा की राजनीति में
किसान सिर्फ़ वोटर नहीं होते —
वह नैरेटिव तय करते हैं।
2020–21 का किसान आंदोलन
बीजेपी के खिलाफ
स्थायी नाराज़गी छोड़ गया।
जाट बहुल इलाकों में…
ग्रामीण क्षेत्रों में…
बीजेपी के खिलाफ गुस्सा था।
कांग्रेस ने आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया…
लेकिन उसका चुनावी फायदा
कांग्रेस को ज़रूर मिला।
जाट और दलित वोटों का आंशिक ध्रुवीकरण
कांग्रेस की पारंपरिक ताकत
जाट और दलित वोट रहे हैं।
2024 में इन दोनों वर्गों का
एक हिस्सा फिर से कांग्रेस की ओर लौटा।
क्यों?
क्योंकि…
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INLD और JJP कमजोर हो चुके थे
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गैर-जाट मुख्यमंत्री से असंतोष था
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बीजेपी से नाराज़गी थी
-
विकल्प सीमित थे
लेकिन ध्यान दीजिए…
यह पूर्ण ध्रुवीकरण नहीं था।
यही कांग्रेस की सबसे बड़ी सीमा थी।
बीजेपी उम्मीदवारों की स्थानीय कमजोरी
लोकसभा चुनाव
मोदी बनाम विपक्ष था।
लेकिन हर सीट पर
मोदी काम नहीं कर पाए।
कई सीटों पर
बीजेपी उम्मीदवार स्थानीय रूप से कमजोर थे।
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गुटबाज़ी
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टिकट वितरण से नाराज़गी
-
जमीनी संपर्क की कमी
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कार्यकर्ताओं की निष्क्रियता
कांग्रेस ने
इन्हीं कमजोर सीटों पर सेंध लगाई।
कांग्रेस की सीमित लेकिन सटीक रणनीति
कांग्रेस ने पूरे हरियाणा में
एक जैसी लड़ाई नहीं लड़ी।
उसने कुछ सीटों को टारगेट किया।
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ग्रामीण और जाट बहुल सीटें
-
बीजेपी की कमजोर सीटें
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स्थानीय मुद्दों पर फोकस
यह रणनीति
पूरे राज्य के लिए पर्याप्त नहीं थी…
लेकिन पाँच सीटों के लिए
काफी थी।
राष्ट्रीय बनाम स्थानीय फैक्टर
2024 का लोकसभा चुनाव
पूरी तरह राष्ट्रीय नहीं था।
और पूरी तरह स्थानीय भी नहीं था।
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मोदी सरकार के खिलाफ माहौल
-
स्थानीय बीजेपी उम्मीदवारों से नाराज़गी
इन दोनों का संगम
कांग्रेस के पक्ष में गया।
फिर यह निर्णायक लहर क्यों नहीं बनी?
यही असली सवाल है।
कांग्रेस 5 सीटें जीत गई…
लेकिन वह पूरे राज्य में
निर्णायक विकल्प क्यों नहीं बनी?
क्योंकि…
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संगठन कमजोर था
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गुटबाज़ी थी (हुड्डा बनाम सैलजा)
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मुख्यमंत्री चेहरा नहीं था
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शहरी और गैर-जाट वोट दूर रहे
-
संसाधन सीमित थे
यानी कांग्रेस जीती ज़रूर…
लेकिन तैयार नहीं थी।
तो निष्कर्ष क्या है?
कांग्रेस की 5 सीटों की जीत
कोई चमत्कार नहीं थी।
यह कई कारकों का मेल था:
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एंटी-इन्कम्बेंसी
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किसान आंदोलन
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जाट और दलित वोटों की वापसी
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बीजेपी उम्मीदवारों की कमजोरी
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सीमित लेकिन सटीक रणनीति
लेकिन यह जीत
सत्ता वापसी की गारंटी नहीं थी।
क्योंकि चुनाव जीतने के लिए
लहर चाहिए…
और सत्ता पाने के लिए
संगठन, नेतृत्व और रणनीति।
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और कमेंट में बताइए —
क्या कांग्रेस ने
लोकसभा की जीत का
फायदा विधानसभा में
गँवा दिया?

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