हरियाणा 2024: लहर थी, सत्ता क्यों नहीं मिली?
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हरियाणा 2024: कांग्रेस की लहर और विधानसभा में हार का रहस्य
नई दिल्ली: 2024 में हरियाणा की राजनीति ने एक अजीब विरोधाभास सामने ला दिया। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 10 में से 5 सीटें जीतकर बड़ा उछाल मारा, जबकि भाजपा को बड़ा झटका लगा। मीडिया में इसे “हरियाणा में कांग्रेस की लहर” के रूप में पेश किया गया।
लेकिन कुछ ही महीनों बाद, विधानसभा चुनाव में वही कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। सवाल उठता है—जब लहर थी, तो सत्ता क्यों नहीं मिली?
लोकसभा 2024: कांग्रेस की वापसी
2019 में हरियाणा में भाजपा ने सभी 10 सीटें अपने नाम की थीं। लेकिन 2024 में कांग्रेस ने पांच सीटें जीतकर शानदार वापसी की।
इसके पीछे कई कारण माने गए:
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केंद्र सरकार के खिलाफ एंटी-इन्कम्बेंसी
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किसान आंदोलन की नाराज़गी
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ग्रामीण इलाकों में असंतोष
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जाट और दलित वोटों का आंशिक ध्रुवीकरण
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कुछ सीटों पर भाजपा के कमजोर उम्मीदवार
मीडिया ने इसे कांग्रेस की “वापसी” कहा, लेकिन यही भ्रम बना कि विधानसभा में भी सरकार बदलना तय है।
विधानसभा में तस्वीर क्यों बदली?
लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक जैसे नहीं होते।
लोकसभा चुनाव में वोट पड़ते हैं:
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प्रधानमंत्री के चेहरे पर
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राष्ट्रीय मुद्दों पर
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केंद्र सरकार के खिलाफ नाराजगी पर
विधानसभा चुनाव में वोट पड़ते हैं:
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स्थानीय उम्मीदवार पर
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संगठन की ताकत पर
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टिकट वितरण और जातीय समीकरण पर
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बूथ मैनेजमेंट पर
यहीं कांग्रेस कमजोर पड़ी।
कांग्रेस की अंदरूनी कमजोरियाँ
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गुटबाज़ी: हरियाणा कांग्रेस दो गुटों में बंटी—हुड्डा और सैलजा। टिकट वितरण में असंतोष, मजबूत नेताओं के बाहर रहने और बागी उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से वोट बंट गया।
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संगठन की कमजोरी: बूथ-स्तरीय नेटवर्क भाजपा के मुकाबले कमजोर रहा।
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गठबंधन की विफलता: कांग्रेस समय पर JJP या अन्य दलों से गठबंधन नहीं कर सकी, जिससे विपक्षी वोट बंट गए।
भाजपा ने कैसे खेल पलटा?
भाजपा ने अपनी कमजोरियों को पहचान कर रणनीति बदली:
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मुख्यमंत्री परिवर्तन का राजनीतिक संदेश
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गैर-जाट वोटों को मजबूत करना
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ओबीसी और शहरी इलाकों में फोकस
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बूथ-स्तरीय प्रबंधन और सीट-वाइज माइक्रो प्लानिंग
हालांकि भाजपा का वोट प्रतिशत बड़ा नहीं बढ़ा, लेकिन सीटों का बेहतर वितरण उन्हें जीत दिला गया।
असली कारण क्या था?
हरियाणा 2024 से स्पष्ट होता है कि लहर जरूरी है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
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लोकसभा में कांग्रेस ने गुस्से का फायदा उठाया।
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विधानसभा में भाजपा ने संगठन और रणनीति से बाज़ी मार ली।
निष्कर्ष साफ है: कांग्रेस के पास मौका और माहौल था, लेकिन रणनीति, संगठन और एकजुट नेतृत्व की कमी ने हार तय कर दी। वहीं भाजपा के पास कम वोट थे, लेकिन बेहतर योजना और संगठन ने उन्हें सत्ता दिला दी।
हरियाणा की राजनीति यह सिखाती है कि वोट प्रतिशत से ज्यादा सीटों का गणित मायने रखता है।
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