कहानी: नरवाना से निकला था एक नेता जिसने सियासत को ईमानदारी सिखाई – चौधरी नेकी राम डुमरखां
कहानी: नरवाना से निकला था एक नेता जिसने सियासत को ईमानदारी सिखाई – चौधरी नेकी राम डुमरखां
नेकी राम डुमरखां — वो नाम जो आज भी हरियाणा की चौपालों में मिसाल बना बैठा है।
👨🌾 किसान जैसा जीवन, लेकिन सोच में मीलों आगे!
🗳️ एक नेता जिसने दो बार चुनाव जीता, पर एक बार भी जनता से रिश्ता नहीं हारा।
🚫 न कोई लाव-लश्कर, न कोई दिखावा — बस सच्चाई और सेवा। और फिर आए उनके बेटे — चौधरी बीरेंद्र सिंह। नेतृत्व ऐसा कि गांव से उठकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे। कांग्रेस का आधार रहे, फिर बने BJP में केंद्रीय मंत्री। पर सोच नहीं बदली — अपने गांव, अपनी मिट्टी, अपने हरियाणा के लिए। 👉 ये कहानी सिर्फ दो नेताओं की नहीं — ये उस राजनीति के दौर की है, जब राजनीति में ज़मीर बिकता नहीं था, जब नेता ‘नेतृत्व’ करते थे, ‘डायलॉग’ नहीं।
📺 वीडियो देखिए और जानिए:
✅ कैसे सत्ता में रहकर भी सादगी को जिया जाता है
✅ कैसे पिता-पुत्र की जोड़ी ने ईमानदारी को विरासत बनाया
✅ कैसे राजनीति आज भी प्रेरणादायक हो सकती है
📰 "वो वक्त जब नेता शब्द का मतलब ईमानदार होता था"आज राजनीति में जहां दलबदल, वादाखिलाफी और बयानबाज़ी आम हो गई है — वहीं हरियाणा के नरवाना से एक नाम ऐसा भी निकला जिसने सत्ता में रहकर भी सादगी और सच्चाई नहीं छोड़ी। नाम था चौधरी नेकी राम डुमरखां। वो 1968 का वक्त था, जब नरवाना ने पहली बार एक ऐसे शख्स को चुना जो न तगड़ी पार्टी से था, न बड़ी दौलत लेकर आया था। फिर भी जनता ने उसे सिर आंखों पर बैठाया। और अगले चुनाव यानी 1972 में उन्होंने बतौर कांग्रेस प्रत्याशी नरवाना से दोबारा जीत दर्ज की।नेकी राम डुमरखां आम किसानों की तरह जीवन जीते थे, पर सोच में बहुत ऊंचे थे। उनका राजनीति में आना किसी बड़े मंच या आंदोलन से नहीं हुआ, बल्कि गाँव की चौपालों से शुरू होकर लोगों के दिलों तक पहुँचने से हुआ। उन्होंने कभी राजनीति को 'पावर' नहीं समझा — उनके लिए यह एक सेवा थी, जिसे उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाया। पहले चुनाव में निर्दलीय खड़े होकर उन्होंने जीत हासिल की, जबकि सामने स्थापित दलों के उम्मीदवार खड़े थे। 1968 की उस जीत ने यह साफ कर दिया कि जनता अब नेताओं में छवि और चरित्र को देख रही है, न कि सिर्फ पार्टी के नाम को। विधानसभा में चौधरी नेकी राम डुमरखां ने बार-बार गाँव, गरीब, किसान, मजदूर की आवाज़ उठाई। उनका एक ही मकसद था — जिनके वोट से वो सत्ता तक पहुंचे, उनके हक की लड़ाई वो पूरी मजबूती से लड़ें। उनकी सबसे बड़ी पहचान थी उनकी सादगी। वो MLA बनकर भी वही पुराने कपड़े पहनते, बिना तामझाम के अपने लोगों से मिलते। ईसरखां गाँव में उन्हें लोग आज भी याद करते हैं, ये कहकर कि "वो नेता था, पर कभी अपनेपन से अलग नहीं हुआ।" 1972 में कांग्रेस से दूसरी बार चुनाव लड़कर उन्होंने फिर से जनता का विश्वास जीता। लेकिन सत्ता के बावजूद उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया। वो सड़क बनवाने से लेकर सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने तक, हर काम को ऐसे करते थे जैसे ये उनकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी हो। राजनीति से अलग होने के बाद भी उन्होंने सामाजिक कार्यों से नाता नहीं तोड़ा। गाँव में शिक्षा और स्वच्छता को लेकर वो लगातार सक्रिय रहे। वो कहते थे — "नेता वो नहीं जो सिर्फ कुर्सी पर बैठे, नेता वो है जो ज़मीन पर भी साथ चले।" आज जबकि राजनीति में विचारधारा से ज़्यादा स्वार्थ हावी हो गया है, तब नेकी राम डुमरखां जैसे नेताओं की कहानियाँ प्रेरणा देती हैं। वो सिर्फ एक नेता नहीं थे — वो उस दौर की पहचान थे जब नेता होने का मतलब ‘नेतृत्व’ होता था, ‘नाटक’ नहीं। चौधरी नेकी राम डुमरखां ने राजनीति को उसके असली अर्थ में जिया — ईमानदारी, सादगी और सेवा के साथ। उनका जीवन हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या आज के दौर में वैसा नेता फिर से लौट सकता है? यह कहानी सिर्फ इतिहास नहीं, एक सवाल है — आज के युवाओं और मतदाताओं से कि क्या वो फिर से नेकी राम जैसे नेताओं को खोजने और चुनने के लिए तैयार हैं? और फिर आए उनके बेटे — चौधरी बीरेंद्र सिंह। नेतृत्व ऐसा कि गांव से उठकर दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे। हरियाणा की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ सत्ता के गलियारों में नहीं बल्कि जनता के दिलों में भी अपनी जगह बना लेते हैं। चौधरी बीरेंद्र सिंह उन्हीं नेताओं में से एक हैं, जिनकी राजनीति की जड़ें गाँव और खेत-खलिहानों से जुड़ी रहीं और जिन्होंने सत्ता की ऊँचाइयों तक पहुँचते हुए भी अपने पैर ज़मीन पर टिकाए रखे। वे उस विरासत से आते हैं जहाँ राजनीति को सेवा का माध्यम माना जाता था, न कि अवसर का ज़रिया। चौधरी बीरेंद्र सिंह के पिता चौधरी नेकी राम डुमरखां नरवाना के दो बार विधायक रहे। उन्होंने ईमानदारी और सादगी के प्रतीक के रूप में राजनीति को एक अलग ही दिशा दी। बेटे बीरेंद्र सिंह ने भी उसी विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन अपने तेज़ और व्यावहारिक राजनीतिक अंदाज़ से एक अलग पहचान बनाई। राजनीति में बीरेंद्र सिंह की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। युवा उम्र से ही उनका झुकाव जनसेवा की ओर था। उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की और धीरे-धीरे हरियाणा कांग्रेस के एक मजबूत स्तंभ बन गए। वर्षों तक कांग्रेस में रहते हुए वे कई अहम मंत्रालयों को संभाल चुके हैं। शिक्षा, सिंचाई, पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे विभागों में उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया। उनके फैसले अक्सर दूरदर्शिता पर आधारित होते थे और यही वजह रही कि उन्हें जनता के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं का भी भरोसा मिला। वे एक ऐसे नेता माने जाते हैं जो खुद फैसले लेने की क्षमता रखते थे और नेतृत्व में नज़र भी आते थे। 2014 का साल हरियाणा और खुद बीरेंद्र सिंह के राजनीतिक करियर में बड़ा मोड़ लेकर आया। उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। यह फैसला न केवल उनकी रणनीतिक समझ को दिखाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि वे समय के साथ खुद को ढालने में सक्षम हैं। भाजपा में शामिल होते ही उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली। वे ग्रामीण विकास, पंचायत राज और स्टील जैसे अहम मंत्रालयों के प्रभारी बने। केंद्र सरकार में मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने हरियाणा और विशेष रूप से अपने क्षेत्र से संपर्क नहीं तोड़ा। वे लगातार ज़मीनी मुद्दों पर बात करते रहे और उनकी प्राथमिकता हमेशा अपने लोगों की भलाई रही। उनकी राजनीतिक ताकत का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उन्होंने 2014 में उचाना कलां विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस की मज़बूत पकड़ मानी जाने वाली इस सीट से जीत दर्ज की। यह जीत सिर्फ एक सीट की नहीं थी, बल्कि पूरे हरियाणा में एक बड़ा संदेश था कि बीरेंद्र सिंह अब भी जनता के दिलों में बसे हुए हैं। राजनीतिक जीवन के साथ-साथ उनका पारिवारिक जीवन भी हरियाणवी परंपराओं और मूल्यों से जुड़ा रहा। उनकी पत्नी प्रेमलता सिंह भी विधायक रह चुकी हैं और बेटा बृजेंद्र सिंह 2019 में हिसार से सांसद चुना गया। यह परिवार अब हरियाणा की राजनीति में एक सशक्त और प्रभावशाली राजनीतिक परिवार बन चुका है, जिसकी पहचान सिर्फ सत्ता से नहीं, बल्कि सेवा से जुड़ी है। बीरेंद्र सिंह के बारे में कहा जाता है कि वे उन नेताओं में से हैं जो सत्ता को साधन नहीं, ज़िम्मेदारी मानते हैं। उनकी राजनीति में आक्रामकता नहीं, बल्कि संतुलन और संवाद रहा है। वे हमेशा अपने कार्यकर्ताओं के लिए उपलब्ध रहे और अपने विरोधियों के लिए सम्मानजनक भाषा का प्रयोग किया। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह रही कि उन्होंने सत्ता के हर स्तर पर काम किया — विधायक, मंत्री, सांसद और केंद्रीय मंत्री — लेकिन हर भूमिका में उन्होंने खुद को जनता का सेवक ही माना। आज के राजनीतिक माहौल में जब अक्सर स्वार्थ, जोड़-तोड़ और बयानबाज़ी हावी रहती है, चौधरी बीरेंद्र सिंह जैसे नेताओं की छवि एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह सामने आती है। राजनीति में बीरेंद्र सिंह की सबसे बड़ी सीख यही रही कि विचारधारा ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है – ईमानदारी, ज़मीन से जुड़ाव और समय की नब्ज़ को पहचानना। उन्होंने कभी भी सत्ता के लिए मूल्यों से समझौता नहीं किया और शायद यही वजह है कि वे आज भी हरियाणा की राजनीति के सबसे सम्मानित चेहरों में गिने जाते हैं।

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